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एक मतला एक शेर

एक मतला एक शेर हम कहानी तुम्हें सुनाते क्या नींद से यकबयक जगाते क्या राहवर के यहां दिवाली थी शहर में दीप जगमगाते क्या

ज़िहाफ़: तय्य (طیی)

                      ज़िहाफ़: तय्य (طیی)                                               तय्य (طیی) उस ज़िहाफ़ को कहते हैं जो रुक्न कै चौथे स्थान के हर्फ़े साकिन को गिराने के लिये लगाया जाता है चौथे स्थान पर साकिन उन अरकान में आता है जिनके प्रारम्भ में दो असबाबे ख़फ़ीफ़ लगातार आते हैं।जैसे :- मस तफ़ इ लुन(مستفعلن) में मस(مس)और तफ़(تف) लगातार दो असबाबे ख़फ़ीफ़ आ रहे हैं तो ऐसी सूरत में तफ़ (تف) के फ़े(ف) को गिराने का काम करेगा।      निम्नलिखित अरकान के प्रारम्भ में दो असबाबे ख़फ़ीफ़ लगातार आते हैं :- मस तफ़ इ लुन(مستفعلن) मफ़ ऊ ला तु(مفعولات)    अगर रुक्न  मस तफ़ इ लुन(مستفعلن) के दूसरे सबबे  ख़फ़ीफ़ के तफ़ (تف) में से फ़े(ف) को गिरा दें तो शेष बचता है मस त इ लुन [2112] (مستعلن)इसे मुफ़ त इ लुन [2112](مفتعلن)से बदल लिया।    अगर रुक्न मफ़ ऊ ला तु(مفعولات)के दूसरे सबबे  ख़फ़ीफ़ के ऊ(عو)के वाव(و)...

ज़िहाफ़= ख़ब्न (خبن)

                   ज़िहाफ़=  ख़ब्न (خبن)      ख़ब्न उस ज़िहाफ़ को कहते हैं जो रुक्न के पहले सबबे ख़फ़ीफ़ के साकिन को गिराता है।    निम्नलिखित अरकान में सबबे ख़फ़ीफ़ पहले आता है:-                                                                  (1) فاعلن(फ़ा इ लुन)[ 212]                                              (2)فاعلاتن(फ़ा इ ला तुन)[ 2122]                                    (3)مستفعلن(मस तफ़ इ लुन)[ 2212]                 (4)مفعولات(मफ़ ऊ ला तु)[ 2212]              ...

GHAZAL=उम्र भर यार से बस हाथ छुड़ाया न गया

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                     ग़ज़ल                        08 GHAZAL=उम्र भर यार से बस हाथ छुड़ाया न गया उम्र भर यार से बस हाथ छुड़ाया न गया इसलिये और कहीं पे जी लगाया न गया पेट की आग बुझाने के लिये  हम से कभी भूल कर शाम को भी रात बताया न गया काम तो हम  भी  बुरे  बक़्त  में    उनके आये बस कभी हम से बो अहसान जताया न गया दिल किसी गुल की तरह आप मसल कर न कहें हम से तो कोई किसी तौर सताया न गया

GHAZAL=दुनिया के किसी दर्द से दो चार नहीं हूं

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                    ग़ज़ल                      07 दुनिया के किसी दर्द से दो चार नहीं हूं दुनिया के किसी दर्द से दो चार नहीं हूं जब से मैं किसी तौर तेरा यार नहीं हूं इन्सान हूं इन्सान से बरताब भी बरतो गुज़री हुई तारीख़ का अख़बार नहीं हूं मख़्लूक़ सताने से मुझे बाज़ जरा आ दरबार में फ़रियाद से लाचार नहीं हूं इस जीस्त की ख़ातिर तेरा दीदार ग़िज़ा है सूरत का तलबगार हूं बीमार नहीं हूं

GHAZAL=मुफ़्त में क्या किया हासिल है तजूर्बा हमने

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                  ग़ज़ल   मुफ़्त में क्या किया हासिल है तजूर्बा हमने                       ग़ज़ल                        06 मुफ़्त में क्या! किया हासिल है तजुर्बा हमने खूब लोगो पे लुटाया है असासा हमने झेल हम तब लें तेरे खार बिना शिकबा हम जब तेरे पास रखा रहन हो रूतबा हमने यक ब यक ही बअसर संगदिलों तक में भी लौ उठी जब कभी साज उठाया हमने तारे गिन गिन के शवेहिज्रां गुज़ारी तन्हा दिलरूबा देख लिया तेरा भी वादा हमने

GHAZAL=अपनी बैचेनियों में किसे मैं पुकारता।

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                  ग़ज़ल                     05 GHAZAL= अपनी बैचेनियों में किसे मैं पुकारता। अपनी बैचेनियों में किसे मैं पुकारता हां इसलिए मैं तुमसे रहा खेल हारता गर बक़्त साथ होता बड़े इत्मिनान से  मैं मुन्तशिर ये केश तुम्हारे संवारता रंजीदगी गले में पहन हार की तरह  गुज़रा हूं ज़िन्दगी से जवानी गुजारता अंजाम से बेफ़िक्र मेरा इश्क़ लो मुझे आंखों की झील में है डुबोता उभारता मुन्तशिर= बिखरी हुई रंजीदगी= दुख